गाँधीजी और नेहरू जी के आर्थिक विचारों की तुलना

गाँधी और नेहरू के आर्थिक विचारों की तुलना

गाँधी और नेहरू के आर्थिक विचारों की तुलना

नेहरू जी गाँधीवाद के प्रबल समर्थक थे। गाँधीजी के सम्पर्क में आकर वह उदारवादी हो गये थे; इतने पर भी गाँधीजी व नेहरू जी की विचारधारा में बड़ा भारी अन्तर है। इस अन्तर को नीचे किया जा रहा है :

  1. नियन्त्रण

    गाँधीजी आर्थिक एवं राजनीतिक सत्ता के नियन्त्रण के पक्ष में नहीं थे। वह उत्पत्ति के साधनों पर राज्य के हस्तक्षेप की बात को भी स्वीकार नहीं करते थे। नेहरूजी आवश्यकतानुसार उत्पत्ति के साधनों, विशेषकर प्राकृतिक साधनों, पर राज्य का नियंन्त्रण लागू करना चाहते थे। इस प्रकार, नेहरूजी नियन्त्रित अर्थ-व्यवस्था के पक्ष में थे।

  2. उत्पादन का पैमाना –

    गाँधीजी भारत की स्थिति को देखते हुए इसके लिए लघु एवं कुटीर उद्योगों को सर्वाधिक महत्त्व देते थे। उन्होंने भारत के लिए बड़े पैमाने के उद्योग-धन्धों की बात कभी भी नहीं कही थी। नेहरूजी भारत की द्रुत आर्थिक प्रगति के लिए लघु एवं कुटीर उद्योगों के स्थान पर बड़े पैमाने के उद्योग-धन्धों के विकास को महत्व देते थे।

  3. मशीनीकरण-

    गाँधीजी मशीनीकरण के पक्ष में नहीं थे। वे दस्तकारी को प्रोत्साहित करना चाहते थे। गाँधीजी के अनुसार मशीनीकरण बेरोजगारी को बढ़ाने के साथ-साथ स्वावलम्बन की भावना को भी नष्ट कर देता है। नेहरूजी उत्पादन को बढ़ाने औद्योगिक क्रान्ति को लाने के लिए मशीनों के प्रयोग को आवश्यक समझते थे।

  4. वर्ग-संघर्ष की समाप्ति-

    वर्ग-संघर्ष की समाप्ति तथा आर्थिक असमानताओं को मिटाने के लिए गाँधीजी की विचारधारा से नेहरूजी की विचारधारा बिल्कुल भिन्न थी। गाँधीजी न्यासधारिता (Theory of Trusteeship) के सिद्धान्त की सहायता से सम्पत्तिशाली वर्ग का हृदय-परिवर्तन करके वर्ग-संघर्ष और धन के असमान वितरण को समान करना चाहते थे। नेहरूजी नियन्त्रण द्वारा पूँजीपतियों व उद्योगपतियों की सम्पत्ति पर रोक लगाना चाहते थे। इस प्रकार, नेहरूजी ने नियन्त्रणों के द्वारा सम्पत्तिशाली वर्ग की सम्पत्ति को सीतिम करने का सुझाव दिया था।

  5. आत्मनिर्भरता –

    गाँधीजी और नेहरूजी, दोनों ही देश की आर्थिक आत्मनिर्भरता की कल्पना करते थे परन्तु इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए जिन साधनों की बात कही गयी है वे साधन अलग-अलग हैं। गाँधीजी देश के संसाधनों की सहायता से देश की आत्मनिर्भरता की बात करते हैं; जबकि नेहरूजी अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सम्बन्धों की सहायता से देश को आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे।

  6. दर्शन सम्बन्धी अन्तर-

    गाँधीजी में भारतीय दर्शन कूट-कूटकर भरा हुआ था। वह इसी दर्शन की प्रेरणा से भारत को आगे बढ़ाना चाहते थे। भारतीय दर्शन से प्रभावित होकर गाँधजी ‘सादा जीवन उच्च विचार’ का सन्देश प्रत्येक भारतीय को देते रहे। जहाँ तक जवाहरलाल नेहरू का प्रश्न है, वह आधुनिक दर्शन से अधिक प्रभावित थे, और उसी के आधार पर भारत को आगे बढ़ाना चाहते थे।

अन्त में, हम इतना कह सकते हैं कि दोनों ही नेता भारत को लोकतन्त्र की सहायता से आगे ले जाना चाहते थे।

गाँधीवाद तथा साम्यवाद में अन्तर

साम्यवाद से हिंसा को निकाल दिया जाय तो यह गाँधीवाद रह जाता है। इसका यह अर्थ हुआ कि गाँधीवाद और साम्यवाद में निकट सम्बन्ध है। गहराई से देखा जाय तो जो उद्देश्य साम्यवाद का है लगभग वही उद्देश्य गाँधीवाद का भी है। साम्यवाद में श्रम के महत्व, श्रम की उन्नति, धन के वितरण की समानता को विशेष महत्व दिया जाता है। इन्हीं मुख्य बातों को गाँधीवाद भी महत्व देता है। गाँधीजी और कार्ल मार्क्स, दोनों ही निर्धनता को मानव समाज के लिए कलंक मानते थे। इस प्रकार, गाँधीवाद व साम्यवाद एक ही पेड़ की दो शाखाएँ मानी जाती हैं।

आधारभूत समानताओं के होने पर भी गाँधीवाद व साम्यवाद में अन्तर है। इस अन्तर को निम्न बातों से स्पष्ट किया जा सकता है :

  1. सामाजिक परिवर्तन की विधियों में अन्तर-

    गाँधीवाद व साम्यवाद, दोनों ही परिवर्तनों के द्वारा नये समाज की रचना करना चाहते हैं, परन्तु दोनों के सामाजिक परिवर्तन के रास्ते अलग-अलग हैं। साम्यवाद समाज में परिवर्तन के लिए हिंसा को महत्व देता है, जबकि गाँधीवाद सामाजिक परिवर्तन के लिए हिंसा की जगह जनता के विश्वास को जीतकर सामाजिक परिवर्तन लाने, की पेशकश करता है। गाँधीजी पूँजीवाद की समाप्ति न्यासधारिता के सिद्धान्त से करना चाहते थे, जबकि साम्यवादी पूँजीवाद की समाप्ति के लिए संघर्ष की सहायता लेते हैं।

  2. सत्ता के स्वरूप में अन्तर-

    साम्यवाद राजनैतिक शक्ति के केन्द्रीकरण में विश्वास रखता है, किन्तु गाँधीवाद राजनैतिक शक्ति के विकेन्द्रीकरण को सबसे उपयुक्त मानता है। गाँधीवाद राजनैतिक शक्ति को संसद से लेकर ग्राम पंचायत तक बाँट देना चाहता है। साम्यवाद आर्थिक केन्द्रीकरण को महत्व देता है, किन्तु गाँधीवाद ग्रामीण एवं लघु उद्योगों को सहकारिता के सिद्धान्त पर चलने की बात को सामाजिक हित में मानता है।

  3. लक्ष्य और साधन सम्बन्धी विचार में अन्तर –

    साम्यवाद उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अच्छे या बुरे साधनों में भेद नहीं करता है, जबकि गाँधीवाद साधनों की अच्छाई और बुराई का विशेष ध्यान रखता है। गाँधीवाद उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सदैव अच्छे साधनों की खोज में रहता है, जबकि साम्यवाद को साधनों की अच्छाई और बुराई से कुछ भी लेना-देना नहीं है।

  4. विचारों का आधार –

    साम्यवादी विचारधारा भौतिकता पर आधारित है, जबकि गाँधीवाद नैतिकता, धर्म तथा आध्यात्मवाद पर निर्मित किया गया है। साम्यवाद में नैतिकता व अनैतिकता में भेद नहीं किया जाता है, जबकि गाँधीवाद नैतिक मूल्यों पर ही आधारित है। साम्यवाद में दया, प्रेम जैसी बातों का अभाव है, जबकि गाँधीवाद बिना दया व प्रेम के जीवित नहीं रह सकता। गाँधीवाद मानव-कल्याण की बात करता है, जबकि साम्यवाद में भौतिक कल्याण को अन्तिम उद्देश्य मान लिया गया है।

  5. समाज-संगठन सम्बन्धी अन्तर-

    साम्यवाद वर्ग-संघर्ष को समाप्त करके मजदूर वर्ग को सत्ता सौंप देना चाहता है। इस प्रकार साम्यवाद में सर्वत्र मजदूर-वर्ग का प्रभुत्व हो जाता है। गाँधीवाद एक ऐसे समाज की कल्पना करता है जिसमें किसी वर्ग विशेष का प्रभुत्व नहीं होता, बल्कि सभी वर्ग समान होते हैं और कोई वर्ग समाज पर अपना प्रभुत्व स्थापित नहीं करता है। इस प्रकार गाँधीजी की कल्पना का समाज वास्तव में वर्गहीन है और उसमें राजनैतिक सत्ता का महत्व धीरे-धीरे समाप्त होकर स्वशासित हो जायेगा। साम्यवाद भी वर्ग-संघर्ष को समाप्त करके वर्गहीन समाज की बात तो करता है, किन्तु वह राजनैतिक सत्ता को श्रमिकों के हाथ में सौंप कर वर्ग को किसी न किसी रूप में जीवित रखना चाहता है।

  6. स्वतन्त्रता सम्बन्धी विचारों का अन्तर-

    गाँधीवाद व्यक्तिगत स्वतन्त्रत को महत्व देता है किन्तु साम्यवाद व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को समाप्त करके शक्ति केन्द्रीकरण पर जोर देता है। गाँधीवाद समाज की अपेक्षा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का पक्षधर है, परन्तु साम्यवाद व्यक्ति की अपेक्षा समाज को अधिक महत्व देता है। गाँधीवाद समाज को प्रजातन्त्रीय व्यवस्था के अधीन संगठित करना चाहता है, जबकि साम्यवाद पूर्णतया तानाशाही प्रवृत्ति पर टिका हुआ होता है।

उपर्युक्त अन्तर के अतिरिक्त, अन्त में हम इतना और कह सकते हैं कि गाँधीवाद स्वात त्याग एवं सहयोग पर आधारित है, जबकि साम्यवाद भोग और स्वार्थ से लिप्त है। यही कारण है कि गाँधीवाद, साम्यवाद से कोसो दूर रह जाता है। जो लोग गाँधीवाद और साम्यवाद को एक ही पेड़ की दो शाखाएँ मानते हैं वे इस बात को भूल जाते हैं कि गाँधीवाद उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जिन साधनों को लेकर आगे बढ़ता है, साम्यवाद में उन साधनों को महत्व नहीं दिया जाता है। यही कारण है कि गाँधीवाद और साम्यवाद में साम्य नहीं है।

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