दादा भाई नौरोजी के आर्थिक विचार

दादा भाई नौरोजी के आर्थिक विचार

दादा भाई नौरोजी के आर्थिक विचार

दादा भाई नौरोजी का जन्म 4 सितम्बर, 1825 को बम्बई के एक पारसी परिवार में हुआ था। नौरोजी बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे, और उनको देश की राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक समस्थाओं में विशेष रुचि थी। इंग्लैण्ड के विभिन्न ब्रिटिश संस्थानों की कार्यप्रणाली के अध्ययन के उपरान्त उन्हें विश्वास हो गया कि यदि ब्रिटिश अपनी परम्पराओं के अनुसार कार्य करेंगे, तो वे अवश्य ही भारतवासियों को समान स्तर तथा न्याय प्रदान करेंगे। 1886 में नौरोजी ने ‘ईस्ट इंडिया एशोसिएशन’ की नींव रखी, तथा राजनीति में प्रवेश किया।

ब्रिटिश संसद में अपने भाषणों तथा अपनी रचनाओं के द्वारा उन्होंने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के दोषों की ओर ध्यान आकर्षित किया और पूरे उत्साह से देश-प्रेम की भावना, उद्देश्यों की विशुद्धता, पूरी लगन तथा जिज्ञासा से कार्य किया। उन्होंने ब्रिटिश संसद में भारत को वैयक्तिक न्याय प्रदान करने के लिए आवाज उठायी और सन् 1885 में उनके प्रयत्न सफल हुए, जब कि इस विषय पर एक रॉयल कमीशन नियुक्त किया गया। इस आयोग ने भी भारत को आशातीत न्याय प्रदान नहीं किया। सन् 1847 में वे बड़ौदा रियासत के प्रधान मंत्री नियुक्त किये गये। सन् 1892 में वे ब्रिटिश संसद के सदस्य निर्वाचित हुए। सन् 1886 तथा 1906 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। उनके आर्थिक विचार हमें उनकी पुस्तक ‘पावर्टी एण्ड अन ब्रिटिश रूल इन इंडिया’ में उल्लिखित मिलते हैं।

  1. निर्धनता की समस्या –

    दादा भाई नौरोजी के अनुसार भारत की मुख्य समस्या भारतवासियों की निर्धनता थी। विभिन्न बातों से भली-भाँति सिद्ध हो जाता है कि भारत दिन-प्रतिदिन निर्धन होता जा रहा था। उदाहरणार्थ – देश की निम्न आर्थिक आय, निम्न आयात एवं निर्यात, निम्न जीवन स्तर, सरकार की निम्न आय, ऊँची मृत्यु दर और निरन्तर उत्पन्न होने वाले अकाल। उनके अनुसार भारत की निर्धनता का मुख्य कारण ब्रिटिश साम्राज्य था। उन्होंने अनुमान लगाया था कि ब्रिटिश इण्डिया की कुल प्रति व्यक्ति आय 20 रूपये प्रति वर्ष थी और सम्पूर्ण देश में प्रति व्यक्ति जीवन-निर्वाह लागत 34 रूपये थी। उन्होंने आवश्यक आँकड़ें एकत्र किये और उनके आधार पर लिखा कि ‘ऐसे भोजन और कपड़े के लिए भी जो कैदी को दिया जाता है, एक अच्छे मौसम में पर्याप्त उत्पादन नहीं हो पाता, थोड़ी-सी विलासिता और सभी सामाजिक एवं धार्मिक समस्याओं एवं परम्पराओं तथा बुरे समय के लिए व्यवस्था करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। उनको जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी प्राप्त नहीं होता। उनके विचार में भारत की निर्धनता इसी कारण था कि उसका पिछला धन नष्ट हो चुका था और यूरोपीय सेवाओं तथा राष्ट्रीय ऋण पर भी अधिक खर्च किया जा चुका था। उनके अनुसार यह एक ऐसी नाली थी, जो भारतीय अर्थ-व्यवस्था को खाली कर रही थी। नौरोजी ने बताया कि जो भी युद्ध अंग्रेजों ने 1858 ई० बाद भारत की भौगोलिक सीमा के बाहर लड़ा, उसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटेन के हितों को सुरक्षित रखना था। इसलिए भारत में ब्रिटिश फौज तथा अन्य सेवाओं पर जो व्यय किया जाता है, उसमें ब्रिटेन को अपना उपयुक्त हिस्सा देना चाहिए। भारत में रेलों की स्थापना का उदाहरण लेते हुए उन्होंने बताया कि जब इंग्लैण्ड में रेल मार्ग स्थापित किये गये तो उनसे प्राप्त सम्पूर्ण आय ब्रिटिश खजाने में जमा होती थी। रेलों के संचालन के लिए जो कर्मचारी नियुक्त किये गये थे, वे अंग्रेज थे और इस प्रकार रेलों पर किया गया व्यय ब्रिटिश जनता को ही वापस मिल जाता था। अतः अंग्रेजों को ही रेलों के सम्पूर्ण लाभ प्राप्त हुए थे किन्तु भारत में स्थिति बिल्कुल उल्टी है। भारतीय रेलों की स्थापना के सम्बन्ध में जो उच्च अधिकारी नियुक्त किये गये, वे इंग्लैण्ड में रहते थे और उनका सारा खर्चा भारतीय रुपये से पूरा किया जाता था। इसके अतिरिक्त अन्य अंग्रेजी कर्मचारियों के वेतनों तथा भत्तों भुगतान भी भारतीय धन में से किया जाता था। केवल थोड़े-से भारतीय ही निम्न पदों पर नियुक्त किये गये थे। इस प्रकार रेलों से भारत को बहुत कम लाभ प्राप्त हुआ था, जबकि विदेशी ऋणों का सम्पूर्ण भार भारत को सहन करना पड़ता था।

  2. विदेशी गमन सिद्धान्त –

    नौरोजी की पुस्तक का मुख्य उद्देश्य यह बताना था कि भारत में ब्रिटिश शासन प्रणाली भारतीयों के लिए विनाशकारी और ब्रिटेन के लिए हितकारक थी। इसी को ‘विदेश गमन सिद्धान्त’ कहते हैं। इस सिद्धान्त का मुख्य सार यह है कि भारतीय जनता की निर्धनता मुख्यतः ब्रिटिश शासन के कारण है, क्योंकि व्यक्तियों पर भारी कर लगा दिये गये थे।

नौरोजी का विचार था कि यदि देश का सम्पूर्ण उत्पादन देश में नहीं लगाया जाता तो पुनरुत्थान कठिन हो जायेगा और उत्पादन की प्रचलित दर पर वार्षिक उत्पादन में से कुछ न कुछ अवश्य ही कम होता चला जायेगा। इस प्रकार एक ओर तो पूँजी का ह्रास होता चला जाता है और दूसरी ओर उत्पादन की दर कम होती जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि नौरोजी विदेशी पूँजी के उपभोग के विरुद्ध थे किन्तु यह सत्य नहीं है, वे विदेशी पूँजी का उपयोग कुछ सीमाओं के अन्तर्गत करना चाहते थे। उन्होंने बताया “कि अन्य देशों में अंग्रेज पूँजीपतियों ने केवल अपना धन ही उधार दिया था। ऋणी देश के निवासियों ने उस पूँजी का उपयोग किया, उससे लाभ प्राप्त किये और पूँजीपतियों को ब्याज अथवा लाभ का भुगतान किया। भारत की स्थिति बिल्कुल भिन्न थी। अंग्रेज पूँजीपतियों ने केवल धन ही उधार नहीं दिया, बल्कि पूँजी के साथ-साथ देश पर आक्रमण भी किया।

  1. भारत की राष्ट्रीय आय-

    राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक घटनाओं की व्याख्या के लिए नौरोजी ने एकरूपी सिद्धान्त की आवश्यकता पर बल दिया था। वह पहले भारतीय थे, जिन्होंने भारत की राष्ट्रीय आय की गणना की और उसमें विभिन्न समूहों के हिस्सों को निर्धारित किया। औपचारिक आँकड़ों के अनुसार उन्होंने 1867-70 ई0 के वर्षों के बंबई प्रेसीडेन्सी में प्रति व्यक्ति आय को 20 रुपये बताया था। उन्होंने यह भी बताया कि साधारण भारतीयों की न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करते समय सेवाओं के मूल्य को सम्मिलित नहीं किया गया था।

नौरोजी का विश्वास था कि किसी भी देश का आर्थिक भविष्य उत्पत्ति के साधनों पर निर्भर करता है। अतः राष्ट्रीय आय बढ़ाना आवश्यक है। उनके अनुसार, राष्ट्रीय आय की गणना करते समय तीन बातों को ध्यान में रखना चाहिए। प्रथम, भारत की कुल वास्तविक भौतिक वार्षिक आय कितनी है। दूसरे, सभी प्रकार के व्यक्तियों की न्यूनतम आवश्यकताएं और साधारण आवश्यकताएं क्या हैं तथा तीसरे, भारत की आय इन आवश्यकताओं के बराबर है या उससे कम अथवा अधिक।

आप पहले भारतीय थे, जिन्होंने राष्ट्रीय आय की गणना प्रति व्यक्ति के आधार पर की थी। उन्होंने देश की अर्थ-व्यवस्था के लिए राज्य की नीतियों के महत्व पर भी प्रकाश डाला था। विदेश गमन सिद्धान्त उनका मुख्य योगदान था। उन दिनों जबकि साहित्यिक विधियाँ पूर्ण नहीं थी और विभिन्न आंकड़े सन्तोषजनक नहीं थे, नौरोजी ने राष्ट्रीय आय की गणना करके सराहनीय कार्य किया था। एक राष्ट्रवादी, भारतमाता के सुपुत्र और व्यावहारिक अर्थशास्त्र, जिसके सामने देश की समस्याओं का स्पष्ट चित्र था, के रूप में नौरोजी का नाम राष्ट्र के इतिहास में सदैव ही स्मरणीय रहेगा।

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