ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में कुटीर उद्योगों का पतन

ब्रिटिश शासन काल में कुटीर उद्योगों का ह्रास (पतन)

अंग्रेजों की शासन-नीति का दुष्परिणाम भारतीय गृह-उद्योगों, लघु-उद्योगों में, दस्तकारी आदि सभी का नष्ट हो जाना था जो भारत के विदेशी व्यापार और उसकी सम्पन्नत का प्रमुख कारण थे। यह क्रिया भी बंगाल, बिहार और उड़ीसा के प्रान्तों से आरम्भ हुई जहाँ से भारत में कंपनी का शासन आरम्भ हुआ था। बंगाल अपने सूती और रेशमी कपड़े के लिए प्रसिद्ध था। कम्पनी के कर्मचारियों ने बंगाल में राजनीतिक सत्ता प्राप्त करते ही बंगाल के दस्तकारों का शोषण आरम्भ कर दिया। उन्होंने भारतीय दस्तकारों और जुलाहों को ऊँचे मूल्य पर कच्चा माल दिया, उनसे एक निश्चित समय में, निश्चित मात्रा में और निश्चित स्तर की बनी वस्तुओं की माँग की तथा उसका मूल्य भी मनमाना दिया। इन नीतियों से कपड़ा बनाने का व्यवसाय कारीगरों के लिए लाभप्रद न रह गया। हजारों कारीगरों ने अपने इस पैतृक व्यवसाय को छोड़ दिया और बंगाल का वस्त्र-उद्योग नष्ट हो गया। भारत का यह आर्थिक शोषण बढ़ता ही गया। 1813 ई. के कम्पनी के आदेश-पत्र के द्वारा सभी अंग्रेज व्यापारियों को भारत से व्यापार करने की आज्ञा प्रदान कर दी गयी जिससे शोषण करने वालों की संख्या में वृद्धि हुई। ब्रिटेन और अंग्रेज भारतीय सरकार ने अपनी-अपनी व्यापारिक नीतियों के द्वारा भारतीय व्यापार को नष्ट किया। ब्रिटेन ने भारत से आयात होने वाले माल पर अत्यधिक कर लगाये जिससे ब्रिटेन के उद्योगों को संरक्षण मिला; जबकि भारत सरकार ने भारत में आयात होने वाले माल पर कम से कम कर लिया जिससे वहाँ का बना हुआ माल भारत में भलीभाँति बिक सके। इस प्रकार दोनों ओर से भारतीय व्यापार पर दबाव पड़ा और वह नष्ट हुआ। विदेशी व्यापार के नष्ट होने से भारतीय उद्योग-धन्धे भी नष्ट हुए। ब्रिटेन में औद्योगिक क्रान्ति के होने जाने से ब्रिटिश और भारतीय सरकार की नीति पर और अधिक प्रभाव पड़ा। ब्रिटेन को अपनी मशीनों से बढ़ते और भारतीय सरकार की नीति पर और अधिक प्रभाव पड़ा। ब्रिटेन को अपनी मशीनों से बढ़ते हुए उत्पादन के लिए भारत से कच्चे माल की अधिक मात्रा में आवश्यकता हुई और अपने बने हुए माल के लिए भारत में बाजार की आवश्यकता हुई। इस कारण 1833 ई. में भारत सरकार ने स्वतंत्र व्यापार की नीति का अनुकरण किया और भारतीय आयात-निर्यात करों को समाप्त करना आरम्भ किया। इससे ब्रिटेन को सस्ता कच्चा माल मिला और भारत में उसकी बनी हुई वस्तुओं को सुविधापूर्ण बाजार। भारत में रेलवे की स्थापना से ब्रिटेन की बनी हुई वस्तुओं को दूर-दूर गाँवों और कस्बों तक पहुँचाने में सुविधा हुई तथा देश के भीतरी भागों से अंग्रेजों को कच्चे माल को खरीदने की सुविधा प्राप्त हुई। इससे भारतीय व्यापार और उद्योग बहुत तीव्रता से नष्ट हुए। भारत की हाथ की बनी वस्तुओं का ब्रिटेन की मशीनों से बनी हुई वस्तुओं मुकाबला करना स्वयं में ही दुष्कर था। ब्रिटेन और भारत सरकार की नीतियों ने इस मुकाबले को असम्भव बना दिया। भारत के सभी उद्योग नष्ट हो गये, मुख्यतः भारतीय कपड़ा उद्योग जो संसार में सबसे अधिक विख्यात था, पूर्णतः नष्ट हो गया। इससे भारत में निर्धनता आई, भूमि पर दबाव पड़ा और किसानों की अतिरिक्त आय जो छोटे-छोटे उद्योगों मुख्यतः सूत की कताई से हुआ करती थी, नष्ट हो गयी। इससे भारत का धन ब्रिटेन गया। वस्तुतः भारत ब्रिटेन के लिए कच्चे माल का उत्पादन करने वाला एक विशाल भू- खण्ड और ब्रिटेन के द्वारा बनाये गये माल की खपत के लिए एक विस्तृत बाजार बन गया। इस प्रकार भारत की निर्धनता का एक मुख्य कारण उसके उद्योगों का नष्ट हो जाना था और इसका उत्तरदायित्व भी विदेशी अंग्रेजी सरकार पर था।

बड़े उद्योग

भारत की आर्थिक स्थिति में कुछ सुधार सम्भव हो सकता था यदि सरकार ने यहाँ मशीनों से युक्त उद्योगों को आरम्भ करने में कुछ रुचि दिखायी होती। परन्तु भारत सरकार ने ऐसा नहीं किया उसने तो 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में व्यक्तिगत प्रयत्नों से आरम्भ हुए भारतीय उद्योगों को भी संरक्षण नहीं दिया। बाद के समय में जब ब्रिटेन में बहुत पूँजी हो गयी और उस अतिरिक्त पूँजी को भारत में लगाया जाना लाभप्रद समझा गया तभी यहाँ कुछ उद्योगों को आरम्भ किया गया। इसी कारण भारत में उद्योगों का आरम्भ मुख्यतः ब्रिटिश पूँजीपतियों द्वारा किया गया। परन्तु इस क्षेत्र में भी भारत सरकार ने उन्हीं उद्योगों को संरक्षण दिया जो ब्रिटेन में आरम्भ नहीं किये जा सकते थे। भारतीय उद्योगपति इस क्षेत्र में, इसी कारण, देर से आये और उन्हें अनेक असुविधाओं का सामना करना पड़ा।

भारत में सर्वप्रथम 1850 ई. में उद्योगों का आरम्भ हुआ तथा कपड़ा, जूट और कोयला निकालने के उद्योग शुरू किये गये। उसके पश्चात् धीरे-धीरे लकड़ी, कागज, ऊन, चमड़ा, लोहा, चीनी, सीमेंट, काँच आदि का उद्योग आरम्भ हुए थे। ये सभी उद्योग अधिकांशतः ब्रिटिश पूँजीपतियों के हाथों में थे। भारतीयों का मुख्य भाग केवल कपड़ा और चीनी के उद्योगों में रहा। भारतीय उद्योगपतियों को सरकार. की कोई सुविधा प्रदान नहीं करती थी। इससे भारत में उद्योगों का विकास बहुत धीरे-धीरे हुआ। भारत के उद्योगों के विकास में एक बड़ी बाधा आधारभूत उद्योगों की कमी भी रही, जैसे भारत ने इस्पात का उत्पादन 1913 ई. में आरम्भ किया। भारत धीमी औद्योगिक प्रगति के कारण अपनी आर्थिक स्थिति को ठीक करने में एक लम्बे समय तक समर्थ न हो सका। इसके अतिरिक्त, भारत के औद्योगिक विकास में एक और भी त्रुटि रही। भारतीय उद्योग कुछ विशेष क्षेत्रों में स्थापित हुए जिससे क्षेत्रीय आर्थिक असमानताओं में वृद्धि हुई और भारत को एक सूत्र में बाँधने में असुविधा हुई।

इस प्रकार, ब्रिटिश शासन में भारतीय कृषि नष्ट हुई, भारत के परम्परागत और श्रेष्ठ उद्योग नष्ट हुए, नवीन आधुनिक उद्योगों का विकास सम्भव न हुआ, भारत का व्यापार भारत के पक्ष में न रहा और भारत का धन विदेश गया। इससे भारतीय गरीबी की अन्तिम रेखा पर पहुंच गये। यह सभी कुछ सरकार की नीतियों के परिणामस्वरूप हुआ जिन्होंने भारत के हित को पूर्णतः भुलाकर ब्रिटेन के आर्थिक हितों की पूर्ति की। इसी कारण सभी विद्वान यह स्वीकार करते हैं कि अंग्रेजी शासन का सबसे बड़ा दोष ब्रिटेन द्वारा भारत का आर्थिक शोषण था।

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