ब्रिटिश भू-राजस्व व्यवस्था का प्रभाव- (सामाजिक जीवन एवं कृषि उत्पादन पर)

ब्रिटिश भू-राजस्व व्यवस्था का प्रभाव

ब्रिटिश भू-राजस्व व्यवस्था का प्रभाव

ब्रिटिश भूराजस्व-व्यवस्था के बड़े दूरगामी परिणाम निकले। इसने पूर्वप्रचलित मान्यताओं तथा व्यवस्थाओं को तोड़कर, अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक जीवन में बुनियादी परिवर्तन किया और पुरानी ग्रामीण आत्मनिरता की स्थिति को समाप्त किया।

स्थायी बंदोबस्त ने एक ऐसे कुलीन वर्ग को जन्म दिया जो कि भारतीय सामाजिक रीति के अनुकूल नहीं था। इसने साम्राज्यवाद को परिपक्व करने में मदद की और शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध हुई क्रांतियों को दबाने में सहायता दी। यह स्थायी बंदोबस्त ही था जिसने प्रारंभ में सरकार को स्थायी दिया और गरीब ग्रामीण कृषक वर्ग को भी गरीब बनाया। जिस प्रकार यूरोप में अभिजात वर्ग क्रांति के विरुद्ध खड़ा हुआ था उसी प्रकार बंगाल में भी यह वर्ग राष्ट्रीय विचारधारा के विपरीत ही रहा।

नई कृषि-व्यवस्था

नई कृषि-व्यवस्था ने भारत की सदियों पुरानी व्यवस्था को तोड़कर नई साम्राज्यवादी व पूँजीवादी शक्ति के लिए शोषण के द्वार खोल दिए। इसके द्वारा गाँव अब कर-निर्धारण और भुगतान की इकाई नहीं रह गए। ज़मीन की निजी मिलकियत के साथ-साथ व्यक्तिगत कर-निर्धारण और कर-अदायगी प्रथा शुरू हुई। कर-भुगतान के तरीके में भी परिवर्तन आया। पहले जहाँ लगान खड़ी फसल का एक भाग होता था और इसकी राशि हर साल अलग हो सकती थी वहाँ नई व्यवस्था के अंतर्गत लगान का आधार फ़सल न खाकर भूमि का टुकड़ा हो गई थी। फ़सल अच्छी हो या बुरी, ‘कर’ की निश्चित राशि में कोई परिवर्तन नहीं होता था। आर्थिक दृष्टि से इन व्यवस्थाओं ने सभी वर्गों (ज़मींदार से लेकर रैयत तक) को प्रभावित किया। लेकिन रैयत सबसे बुरी अवस्था में थी। ज़मींदार निश्चित राशि कर के रूप में देकर इस मामले में सरकार के क्रोध से मुक्त हो जाता था। वह कितनी राशि रैयत से ऐंठे, यह वस्तुतः उसकी इच्छा पर निर्भर करता था। रैयत और ज़मींदार के बीच लगान का निर्धारण एक आपसी मामला मानकर छोड़ दिया गया था। इसलिए ज़मींदार कृषक से जितना भी धन बटोर सकता था, बटोरता था। इसमें कोई शक नहीं कि सब भुगतानों के बाद किसान के पास जो कुछ बचा रहता था उससे वह जिंदा भर रह सकता था। वैसे भी अब लगान का भुगतान फ़सल (वस्तु) की बजाय मुद्रा में किया जाना था जिसका उसके पास सदा अभाव था।

नए कानूनों के अंतर्गत बेदख़ली के अधिकार साहूकार या सरकार को प्रदान करने के कारण भूमि की बेदखली बड़े पैमाने पर होने लगी। इस तरह किसान, जो कि पहले भूस्वामी था, धीरे-धीरे दूसरे की जमीन जोतने वाला खेतिहर मज़दूर बनता चला गया।

मार्क्सवादी भाषा में भी पूँजीवादी आर्थिक व्यवस्था के अनुसार उन तीन आर्थिक वर्गों का जन्म हुआ जिन्हें आर्थिक स्तर पर उच्च, मध्य व निम्न वर्गों में बाँटा जा सकता है।

जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि, जमींदार वर्ग पूँजीवादी कंपनी सरकार की कृषि नीति का सीधा परिणाम था। वह ब्रिटिश सामंती प्रथा पर आधारित था जिसे अंग्रेज अपने देश में समाप्त कर चुके थे। भारतीय इससे पूर्णतया अनभिज्ञ थे और यह भारतीय परंपराओं के विपरीत भी थी। 1853 में मार्क्स ने कृषि व्यवस्था के बारे में लिखा था कि ज़मींदारी प्रथा या रैयतवारी व्यवस्था दोनों ही अंग्रेजों द्वारा लाई गई कृषि क्रांतियाँ थीं और एक-दूसरे की विरोधी थीं। इनमें से पहली अभिजाततंत्रीय और दूसरी जनतांतिक थीं। जमींदारी प्रथा अंग्रेजी भू-स्वामित्व का विकृत रूप थी और बटाईदरी प्रथा फ्रांसीसी मिलकियत का। दोनों ही व्यवस्थाएँ हानिकारक थीं। बिलकुल विरोधी तत्वों के मिश्रण से बनी इन प्रथाओं में से कोई भी प्रथा न तो जोतने वालों के इन व्यवस्थाओं से फायदा था। हित में थी और न ही जमीन के मालिकों के हित में। केवल भू-कर लगाने वाली सरकार को ही

कृषि-उत्पादन पर प्रभाव

साम्राज्यवादियों की कृषि-नीति ने केवल उन नए सामाजिक आर्थिक वर्गों को जन्म ही नहीं दिया बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति को अपने औपनिवेशिक हितों के अनुरूप भी ढाला। इसके साथ ही उसकी नीति ने कृषि-उत्पादन पर भी गहरा असर डाला। अंग्रेजों के आने से पहले भारत में जहाँ कृषि-उत्पादन में आत्मनिर्भरता थी वहाँ अंग्रेजों के आने के बाद कृषि-उत्पादन में काफ़ी गिरावट आई। इस गिरावट के लिए उनकी कृषि-नीति व औद्योगिक नीति दोनों ही उत्तरदायी थीं। 1813 तक ब्रिटिश कंपनी ने व्यापारिक क्षेत्र में एकाधिकार को अपनाया। इसका परिणाम यह हुआ कि बहुत से राजशिल्पी कारीगर बेकार हो गए और वे शहरों को छोड़कर गाँवों की तरफ जाने को मजबूर हुए जहाँ उन्होंने कृषि को जीविकोपार्जन का साधन बनाया। कृषि, जो कि पहले ही ब्रिटिश नीति का शिकार थी, और भी बोझ से दब गई। जहाँ 1881 में भारत की कुल आबादी का 61% भाग खेती पर निर्भर था, 1931 तक यह निर्भरता 75% तक पहुंच गई। इसके साथ भूमि का विभाजन और उपविभाजन भी शुरू हो गया।

जहाँ भारत में खेती पर निर्भर करने वालों की संख्या बढ़ रही थी वहाँ यूरोप में इसका उलटा हो रहा था। 1875 1925 तक पाँच के दशकों में खेतिहरों की आबादी 67.7 प्रतिशत से ज्ञटकर 53.6 प्रतिशत; जर्मनी में 61 प्रतिशत से घटकर 37.8 प्रतिशत, इंग्लैण्ड और वेत्स में 38.2 प्रतिशत से घटकर 20.7 प्रतिशत और डेनमार्क में 71 प्रतिशत से घटकर 57 प्रतिशत हो गई। ज़ाहिर है कि भूमि उत्पादन और खेती में लगे लोगों के बीच असंतुलन था जिसका आधार साम्राज्यवादी सरकार और उसकी शोषणकारी नीति ही था। भूमि पर आश्रित लोगों की संख्या बढ़ने के कारण उत्पादन में भारी गिरावट आना स्वाभाविक ही था।

साम्राज्यवादियों ने खेती की गिरावट के लिए भारतीय कृषि-भूमि और कृषक को उत्तरदायी ठहराया। लेकिन वास्तव में कृषि उत्पादन की कमी का कारण, जैसा कि सर जॉर्ज कार ने 1894 में कहा था, अनुर्वरता नहीं था। “यदि अविकसित साधनों के मूल्य और विस्तार को देखा जाए तो संसार के बहुत कम देशों में खेती के इतने शानदार ढंग से विकास की क्षमता है जैसी कि भारत में है। भारत की मिट्टी कम उपजाऊ नहीं थी लेकिन उपनिवेशवादियों ने इसे ऐसा बना दिया। यहाँ के तराई के क्षेत्र एक ज़माने में दुनिया के सबसे उर्वर प्रदेश रहे होंगे।” पूँजी के अभाव के कारण किसान खेती में सुधार नहीं ला सकता था, उसके ऊपर भारी लगान देना पड़ता था। मैक्डोनल के ज्ञापन में बताया गया था “यहाँ की मिट्टी की उत्पादकता इसलिए कम होती गई कि बिना खाद डाले लगातार खेती की गई और ईंधन की कमी के कारण खाद का इस्तेमाल ईंधन की जगह किया गया। जहाँ पश्चिमी देशों में डंठल और भूसे का इस्तेमाल खाद के लिए होता था वहाँ भारत में सारे-का-सारा डंठल और भूसा जानवरों को खिलाने के काम में लाया जाता था और गोबर को घरों में जलाने के काम में लाया जाता था।’ वास्तव में इसका कारण भी पूँजी का अभाव था क्योंकि जानवरों को भूसा खिलाने के लिए चरागाहों का अभाव था और घरों में जलाने के लिए लकड़ी उपलब्ध नहीं थी क्योंकि सरकार ने जंगली लकड़ी व कोयले पर प्रतिबंध लगा रखा था। साथ ही उसका मूल्य चुकाना भी किसान की पहुँच के बाहर था। अंग्रेजी शासकों ने अपनी नीतियों पर पर्दा डालने के लिए सदा कृषक को ही दोषी माना।

भूमि का विखंडीकरण

कृषि पर बढ़ते दबाव व साहूकार की पकड़ के कारण ज़मीन के उपविभाजन और विखंडन की प्रक्रिया भी तेज़ हुई। एग्रीकल्चरल जर्नल ऑफ़ इंडिया (1926) में जोतों का निम्नलिखित वर्गीकरण किया गया : 10 एकड़ से ऊपर 24 प्रतिशत, 5 से 10 एकड़ 20 प्रतिशत; 1 से 5 एकड़ 33 प्रतिशत; 1 एकड़ या उससे कम 23 प्रतिशत। जोतों के विखंडन के कारण किसानों के लिए सुचारू रूप से खेती करना भी कठिन था। उपविभाजन की हालत यह थी कि अनेक छोटे खेतों में हल का भी इस्तेमाल संभव नहीं था। जोतों के अधिकाधिक विखंडीकरण के कारण खेतिहर मज़दूरों की तादाद बढ़ती गई और खेती में कदाल और फावड़े का अधिकाधिक इस्तेमाल होने लगा।

कृषि का वाणिज्यीकरण

कृषि व कृषक की दुर्गति करने के लिए केवल औपनिवेशिक सरकार की कृषि नीति ही नहीं वरन् औद्योगिक नीति भी ज़िम्मेदार थी। 1813 के बाद भारत में व्यापारिक एकाधिकार समाप्त कर दिया गया और मुक्त व्यापार की नीति अपनाई गई। अब भारत में केवल ब्रिटिश पूँजीवादी व्यवस्था को सुदृढ़ करने वाला देश ही नहीं वरन् ब्रिटिश पूँजीपतियों के लिए एक मंडी भी बन गया गया था जिसके कारण यहाँ का कुटीर उद्योग नष्ट हुआ। चूंकि ब्रिटेन ने उद्योगीकरण पूरे जोर पर था अतः उसे सस्ते-कच्चे माल की आवश्यकता पड़ी जिससे अब भारत कच्चे माल का उत्पादन करने वाला देश बना।

किसानों की गरीबी

लगान तथा कृषि व उत्पादन के मंहगेपन ने किसान को भारी बोझ तले दबा दिया जिससे वह उबर नहीं सका। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसान ने ऋण का सहारा लिया। अंग्रेज प्रशासकों ने किसान की इस ऋण ग्रस्तता का कारण लगान की अधिकता नहीं बताया। इन हालात के लिए उन्होंने उसकी फ़िजूलखर्ची व सामाजिक उत्सवों (शादी तथा दूसरे उत्सवों) में धन फूंकने की आदत को उत्तरदायी ठहराया जो किसी भी रूप में सच नहीं था। भारी लगान व साहूकार की मनमानी के कारण किसान ऋणग्रस्तता में धंसता ही चला गया और उसके दुःखों का बोझ बढ़ता ही गया क्योंकि यह ऋणग्रस्तता ही थी जिसके कारण उसकी ज़मीन उसके हाथों से खिसकती जा रही थी। सरकार की तरफ़ से किसान से साहूकार की दिशा में इस हस्तांतरण को रोकने के लिए कुछ कानूनों का भी निर्माण किया गया, जैसे बंगाल काश्तकारी अधिनियम, 1859, मद्रास काश्तकारी अधिनियम, 1889, दक्कन कृषि सहायता अधिनियम जो आगे चलकर बंबई प्रेसीडेंसी पर भी लागू किया गया, मध्य प्रदेश काश्तकारी अधिनियम, 1898 आदि। लेकिन ये अधिनियम अधिक सफल नहीं हुए और किसान की स्थिति में किसी प्रकार का सुधार लाने में असमर्थ रहे।

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